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न्यूनताग्रस्तों को हमारी सहानुभूति की नहीं बल्कि प्यार की आवश्यकता है। उनके प्रति स्नेह और अपनापन चाहिए। इस बात को इस पुस्तिका के लेखक श्री. न.श्रीनिवासजी ने अत्यंत ह्रुदयस्पर्शी रूप में बताया है। यहाँ चित्रित किया गया है कि चतुर मोनी जैसे लोग न्यूनता के शिकार होते है तथा हम प्यार और अपनेपन से उनकी ज़िदगी को मधुर कैसे बना सकते हैं।